88929. رَيْشَانُ1 88930. رَيْشَان1 88931. رِيشَة1 88932. رَيْشد1 88933. رِيشَهْرُ1 88934. رِيشَهْر188935. ريشهر1 88936. رِيشيّ1 88937. رَيَشيّ1 88938. رَيْشِيّ1 88939. رِيشيّة1 88940. رَيَشيَّة1 88941. رَيْشيّة1 88942. ريشيه1 88943. ريصال1 88944. رَيْط1 88945. رَيَطَ1 88946. ريط13 88947. رَيَطَ 1 88948. رِيع1 88949. رَيَعَ1 88950. ريع17 88951. رَيْع الأرض1 88952. رَيَعَ 1 88953. رَيْعَانُ1 88954. رَيْعَان1 88955. ريعان1 88956. رَيَعَان1 88957. رَيْعي1 88958. ريعي1 88959. رِيغ1 88960. ريغ8 88961. ريغي1 88962. رَيَفَ1 88963. ريف13 88964. رَيَفَ 1 88965. رَيَقَ1 88966. ريق13 88967. رَيَقَ 1 88968. ريقن1 88969. رِيقه1 88970. رَيْقيّ1 88971. رِيقيّ1 88972. ريك2 88973. ريكا1 88974. رِيكَة1 88975. ريكردو1 88976. ريكستان1 88977. ريكنج1 88978. رِيكَنز1 88979. ريل8 88980. رَيَّل1 88981. ريله1 88982. ريم15 88983. رَيَمَ1 88984. رِيم1 88985. رَيْم1 88986. رَيَمَ 1 88987. ريماز1 88988. رَيْمَانُ1 88989. رَيْمَان1 88990. رِيمَةُ1 88991. رَيمَةُ1 88992. رِيَمة1 88993. رَيْمَة1 88994. ريمت1 88995. ريمه1 88996. ريموس1 88997. ريموندا1 88998. ريمين1 88999. رين19 89000. رَيَنَ1 89001. رَيَنَ 1 89002. ريناتي1 89003. رينالدو2 89004. رينق1 89005. رينيه1 89006. ريه8 89007. رَيَهَ 1 89008. رِيهام1 89009. ريهت1 89010. ريهق1 89011. رَيْهَقان1 89012. رَيْهُقَانَ1 89013. رِيْو1 89014. رَيُو1 89015. ريو1 89016. ريوج1 89017. رِيوْدَد1 89018. رِيوْدَى1 89019. رِيْوَذ1 89020. رِيْوَرْثُون1 89021. رِيْوَقان1 89022. رِيوَنْج1 89023. رِيْوَنْد1 89024. ريى1 89025. ريي6 89026. ز5 89027. زءب1 89028. زءبر1 Prev. 100
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رِيشَهْر:
قال حمزة: هو مختصر من ريو أردشير:
وهي ناحية من كورة أرّجان كان ينزلها في الفرس كشته دفتران، وهم كتّاب كتابة الجستق، وهي الكتابة التي كان يكتب بها كتب الطب والنجوم والفلسفة، وليس بها اليوم أحد يكتب بالفارسيّة ولا بالعربية، وكان سهرك مرزبان فارس وواليها أعظم ما كان من قدوم العرب إلى أرض فارس،
وذلك أن عثمان بن أبي العاصي الثقفي والي البحرين وجّه أخاه الحكم في البحر حتى فتح توّج وأقام بها ونكأ فيما يليها، فأعظم سهرك ذلك واشتدّ عليه وبلغته نكايتهم وبأسهم وظهورهم على كلّ من لقوه من عدوّهم فجمع جمعا عظيما وسار بنفسه حتى أتى ريشهر من أرض سابور وهي بقرب من توّج، فخرج إليه الحكم وعلى مقدّمته سوّار بن همّام العبدي فاقتتلوا قتالا شديدا، وكان هناك واد قد وكل به سهرك رجلا من ثقاته وجماعة وأمره أن لا يجتازه هارب من أصحابه إلّا قتله، فأقبل رجل من شجعان الأساورة مولّيا من المعركة فأراد الرجل الموكل بالموضع قتله فقال له: لا تقتلني فإنّنا إنّما نقاتل قوما منصورين وإن الله معهم، ووضع حجرا فرماه ففلقه، ثمّ قال: أترى هذا السهم الذي فلق الحجر؟ والله ما كان ليخدش بعضهم لو رمي به! قال: لا بدّ من قتلك، فبينما هو كذلك إذ أتاه الخبر بقتل سهرك، وكان الذي قتله سوّار بن همّام العبدي، حمل عليه فطعنه فأذراه عن فرسه فقتله، وحمل ابن سهرك على سوّار فقتله، وهزّم الله المشركين وفتحت ريشهر عنوة، وكان يومها في صعوبته وعظيم النعمة على المسلمين فيه كيوم القادسية، وتوجّه بالفتح إلى عمر عمرو بن الأهتم التميمي فأشار يقول:
جئت الإمام بإسراع لأخبره ... بالحقّ عن خبر العبديّ سوّار
أخبار أروع ميمون نقيبته، ... مستعمل في سبيل الله مغوار
ثمّ ضعفت فارس بعد قتل سهرك حتى تيسّر فتحها، كما نذكره في موضعه.