85309. رأى9 85310. رأَى1 85311. رَأى على1 85312. رَأَى 1 85313. رأي8 85314. رَأْي بـ185315. رَأْي عن1 85316. رَأيَان1 85317. رؤؤية1 85318. رُؤاس1 85319. رُؤَافٌ1 85320. رُؤامٌ1 85321. رُؤْبٌ1 85322. رؤد1 85323. رؤف1 85324. رؤوس الآي1 85325. رُؤوس الشياطين1 85326. رَؤوف1 85327. رَؤوفة1 85328. رَؤُوفة1 85329. رُؤْيَا1 85330. رُؤيَا1 85331. رُؤْيا الْمُؤمن1 85332. رُؤْيَا عربية1 85333. رُؤْيَات1 85334. رُؤيَةُ1 85335. رؤية2 85336. رُؤَيَّتَان1 85337. رِئاسة1 85338. رِئامٌ1 85339. رئس1 85340. رَئِس1 85341. رئف1 85342. رُئم1 85343. رِئمٌ1 85344. رئم1 85345. رَئِمَ1 85346. رئي1 85347. رئيس1 85348. رئيسُ أهل السنة1 85349. رئيس العلوم1 85350. رئيسة1 85351. رَئيسيّ1 85352. رَئِيْسِيَان1 85353. رَئيسِيَّة1 85354. رئيفة1 85355. را1 85356. راء1 85357. راءاه1 85358. راءس1 85359. راءل1 85360. راءم1 85361. راءوس1 85362. راؤول1 85363. رائحة طيبة1 85364. رَائِد1 85365. رائد1 85366. رَائدة1 85367. رَائِسٌ1 85368. رَائِعٌ1 85369. رَائِعَة1 85370. رَائِف1 85371. رَائِفَة1 85372. رَابَ1 85373. راب1 85374. رابأه1 85375. راباه1 85376. رابَةُ1 85377. رابتا1 85378. رابجة1 85379. رَابِح1 85380. رَابِحات1 85381. رَابحة1 85382. رابحه1 85383. رابِخٌ1 85384. رابدة2 85385. رابر1 85386. رابس1 85387. رابط1 85388. رَابِع1 85389. رَابعة1 85390. رابعة العدوية1 85391. رَابِعة النهار1 85392. رابِغٌ1 85393. رابغ1 85394. رابِغَةُ1 85395. رابل1 85396. رابه1 85397. رَابِيَا1 85398. راتب1 85399. راتّة1 85400. راتِجٌ1 85401. راتنج1 85402. راتيا1 85403. راتِيَانَج1 85404. راتيب1 85405. راتية1 85406. راتينج1 85407. راث2 85408. رَاثَان1 Prev. 100
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رَأْي بـ
الجذر: ر أ ي

مثال: ما رَأْيك بذلك؟
الرأي: مرفوضة
السبب: لتعدية الفعل بـ «الباء»، وهو يتعدّى بـ «في».

الصواب والرتبة: -ما رَأْيك في ذلك؟ [فصيحة]-ما رَأْيك بذلك؟ [صحيحة]
التعليق: أجاز اللغويون نيابة حروف الجر بعضها عن بعض، كما أجازوا تضمين فعل معنى فعل آخر فيتعدى تعديته، وفي المصباح (طرح): «الفعل إذا تضمَّن معنى فعل جاز أن يعمل عمله». وقد أقرَّ مجمع اللغة المصري هذا وذاك، ومجيء «الباء» بدلاً من «في» كثير في الاستعمال الفصيح، ومنه قوله تعالى: {وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ بِبَدْرٍ} آل عمران/123، وقوله تعالى: {إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ} آل عمران/96، وتجري الباء مجرى «في» في دلالتها على الظرفية كما ذكر الهمع وغيره؛ ومن ثَمَّ يمكن تصحيح الاستعمال المرفوض.